Wednesday, June 10, 2026

केरल में ड्रग्स का जाल गहराया, लग्जरी पार्टियां बनीं अड्डा

केरल ड्रग्स नेटवर्क अब राज्य के लिए गंभीर खतरा बनता जा रहा है। यह समस्या केवल कानून-व्यवस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज के कई हिस्सों को प्रभावित कर रही है। हाल के समय में ड्रग्स के इस्तेमाल और तस्करी दोनों में तेजी आई है।

केरल ड्रग्स नेटवर्क के तहत राज्य अब ट्रांजिट प्वाइंट के साथ-साथ उपभोग का भी बड़ा केंद्र बन गया है। जांच एजेंसियां अब केवल सप्लायर और कैरियर ही नहीं, बल्कि उपभोक्ताओं पर भी नजर रख रही हैं। इससे साफ है कि समस्या जड़ तक फैल चुकी है।

पुलिस के अनुसार, ड्रग्स के प्रकार में भी बड़ा बदलाव आया है। पहले जहां गांजा अधिक प्रचलित था, अब उसकी जगह हेरोइन, MDMA और एक्स्टेसी जैसे सिंथेटिक ड्रग्स ने ले ली है। ये ड्रग्स ज्यादा खतरनाक हैं और इन्हें छिपाना भी आसान होता है।

जांच में एक और चिंताजनक पहलू सामने आया है। तस्कर अब प्रवासी मजदूरों का इस्तेमाल कैरियर के रूप में कर रहे हैं। उन्हें नौकरी का लालच दिया जाता है या फिर डराकर इस अवैध काम में धकेला जाता है। जो मना करते हैं, उन्हें वापस भेजने की धमकी दी जाती है।

पिछले डेढ़ साल में करीब 103 प्रवासी मजदूर इस मामले में पकड़े गए हैं। इनमें अधिकतर असम और पूर्वोत्तर राज्यों से जुड़े लोग हैं। यह स्थिति सामाजिक शोषण की ओर भी इशारा करती है।

इसके अलावा, तस्करी के नए तरीके भी सामने आए हैं। रेलवे स्टेशनों पर बैग छोड़कर ड्रग्स सप्लाई करने का तरीका अपनाया जा रहा है। बाद में संपर्क के जरिए कोई और व्यक्ति उसे उठा लेता है। इससे तस्कर सीधे पकड़ में नहीं आते।

दूसरी ओर, लग्जरी पार्टियों में ड्रग्स का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है। हाई-प्रोफाइल होटल और निजी पार्टियां अब जांच एजेंसियों के निशाने पर हैं। इन पार्टियों में MDMA और एक्स्टेसी जैसे महंगे ड्रग्स का उपयोग हो रहा है।

हाल ही में एक कार्रवाई में 183.55 ग्राम MDMA और 93.51 ग्राम एक्स्टेसी बरामद की गई। इसके बाद पुलिस ने जांच का दायरा और बढ़ा दिया है। इससे संकेत मिलता है कि नेटवर्क काफी बड़ा और संगठित है।

जांच में अंतरराज्यीय और अंतरराष्ट्रीय कनेक्शन भी सामने आए हैं। कर्नाटक और दिल्ली जैसे राज्यों से ड्रग्स की सप्लाई हो रही है। साथ ही, केरल की लंबी समुद्री तटरेखा इसे अंतरराष्ट्रीय तस्करों के लिए आसान रास्ता बनाती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि ‘गोल्डन क्रेसेंट’ और ‘गोल्डन ट्रायंगल’ जैसे नेटवर्क भी इसमें शामिल हो सकते हैं। इससे समस्या और जटिल हो जाती है। ऐसे में सख्त कार्रवाई और जागरूकता दोनों जरूरी हैं।

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