स्मार्ट प्रीपेड मीटर पर विवाद, आदेश वापस लेने की मांग तेज
उत्तर प्रदेश में “स्मार्ट प्रीपेड मीटर” को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। यूपीपीसीएल द्वारा प्रीपेड मीटर को अनिवार्य किए जाने के फैसले के खिलाफ अब आवाज तेज हो गई है। प्रदेश राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद ने इस आदेश को वापस लेने की मांग की है।
परिषद का कहना है कि केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण द्वारा जारी नई अधिसूचना के बाद प्रीपेड मीटर को अनिवार्य नहीं रखा जा सकता। ऐसे में बिजली कंपनियों को उपभोक्ताओं को पोस्टपेड विकल्प भी देना चाहिए। यदि ऐसा नहीं किया गया, तो नियामक आयोग का रुख किया जाएगा।
“स्मार्ट प्रीपेड मीटर” को लेकर उपभोक्ता परिषद लगातार दबाव बना रहा है। परिषद अध्यक्ष के अनुसार, यदि बिजली कंपनियां जबरन प्रीपेड मीटर लागू करती हैं, तो यह उपभोक्ताओं के अधिकारों का उल्लंघन होगा। इस स्थिति में उपभोक्ता सीधे विद्युत नियामक आयोग में शिकायत दर्ज करा सकते हैं।
प्रदेश में अब तक 70 लाख से अधिक स्मार्ट प्रीपेड मीटर लगाए जा चुके हैं। इनमें कई ऐसे उपभोक्ता भी शामिल हैं, जिनकी सहमति के बिना उनके कनेक्शन को प्रीपेड मोड में बदल दिया गया। इस कारण लोगों में असंतोष बढ़ रहा है।
नई व्यवस्था के तहत उपभोक्ताओं को दो विकल्प मिलने चाहिए। पहला, प्रीपेड मोड जिसमें मोबाइल की तरह पहले रिचार्ज करना होता है। दूसरा, पोस्टपेड मोड जिसमें बिजली इस्तेमाल के बाद बिल का भुगतान किया जाता है। परिषद का कहना है कि यह विकल्प देना जरूरी है।
केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण ने 2022 के नियमों में संशोधन करते हुए अनिवार्य प्रीपेड मीटर के प्रावधान को समाप्त कर दिया है। इसके बाद भी यदि राज्य स्तर पर इसे जबरन लागू किया जाता है, तो यह नियमों के खिलाफ माना जाएगा।
“स्मार्ट प्रीपेड मीटर” का उद्देश्य पारदर्शिता और बिजली चोरी रोकना है, लेकिन इसे लागू करने के तरीके पर सवाल उठ रहे हैं। उपभोक्ताओं का कहना है कि उन्हें बिना सहमति के इस प्रणाली में डालना उचित नहीं है।
मामले को लेकर अब विद्युत नियामक आयोग की भूमिका महत्वपूर्ण हो गई है। परिषद ने संकेत दिया है कि यदि जल्द समाधान नहीं हुआ, तो आयोग से हस्तक्षेप की मांग की जाएगी।
कुल मिलाकर, “स्मार्ट प्रीपेड मीटर” को लेकर प्रदेश में नीति और उपभोक्ता अधिकारों के बीच टकराव की स्थिति बन गई है। आने वाले समय में इस मुद्दे पर बड़ा फैसला सामने आ सकता है।
